निवारक उपायों की कमी, जागरूकता के अभाव से डायबिटीज के 50 प्रतिशत रोगी होते हैं किडनी फेलियर के शिका

Posted On Fri, March 13, 2020, 2:56 PM
• डायबिटीज के कारण छोटी रक्तवाहिकाएं क्षतिग्रस्त होती है, परिणास्वरूप किडनियां आपके रक्त को सही तरीके से शुद्ध नहीं कर पाती • ब्लड ग्लूकोज का और ब्लड प्रेशर का स्तर नियंत्रित रखना ही किडनी रोगों से बचाव का अति प्रभावी तरीका • भारत में किडनी फेलियर रोगियों में युवा अधिक, इससे कामकाजी आबादी होती है प्रभावित • 40 से 50 प्रतिशत किडनी के जटिल रोग संभव

जयपुर, 11 मार्च, 2020। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि डायबिटीज से सम्बन्धित स्थितियां बढ़ रही हैं, जयपुर के फोर्टिस एस्कॉर्ट्स अस्पताल के डॉक्टरों ने कहा कि जीवनशैली में गड़बड़ी से न केवल जयपुर में बल्कि दुनिया भर में किडनी फेल होने का भार बढ़ा है। डॉक्टरों का कहना है लोगों को डायबिटीज के बारे में सीमित ज्ञान एवं जागरूकता है, नतीजतन इस प्रकार के रोगी के जीवनकाल में किडनी क्षतिग्रस्त होने की अधिक संभावना है, यहां तक कि उन्हें इस बात का पता ही नहीं चल पाता और किडनिया नाकाम होने के बाद ही वे समझ पाते हैं। किडनी फेलियर को क्रोनिक किडनी डिजीज(सीकेडी) का अंतिम चरण है।

किडनी फेलियर, जिसे नेफ्रोपैथी, गुर्दे की कमी या गुर्दे की विफलता के रूप में भी जाना जाता है, एक ऐसी स्थिति है जिसमें किडनियां ठीक से काम नहीं करती हैं, और रक्त से अपशिष्ट उत्पादों को फिल्टर नहीं कर पाती हैं। अपशिष्ट उत्पादों को रक्त से छानना किडनी का मुख्य कार्य है। गुर्दे की विफलता वाले मरीजों को या तो डायलिसिस से गुजरना होता हैं, जो कि एक कृत्रिम रक्त-सफाई प्रक्रिया है, या दाता से एक स्वस्थ किडनी प्राप्त कर उसे प्रत्यारोपित करानी होती है।

इस बारे में फोर्टिस एस्कॉर्ट्स हॉस्पिटल के कन्सलटेन्ट नेफ्रोलॉजी डॉ राजेश गरसा ने कहा ‘‘डायबिटीज एक प्रणालीगत बीमारी है, इसके प्रभाव शरीर के लगभग सभी हिस्सों में महसूस किए जाते हैं। डायबिटीज से संबंधित अधिकांश जटिलताएं रक्त वाहिकाओं की समस्याओं से सम्बन्धित होती हैं, जिनमें आमतौर पर रक्त प्रवाह में परिवर्तन या रक्त के थक्के की क्षमता अधिक होना शामिल हैं। इन जटिलताओं को आम तौर पर दो विशाल श्रेणियों में बांटा जा सकता हैः माइक्रोवैस्कुलर (जिनमें छोटी रक्त वाहिकाए शामिल हैं) और मैक्रोवास्कुलर (जिनमें बड़ी रक्त वाहिकाएं शामिल हैं)। आंख, किडनी और तंत्रिका सम्बन्धी जटिलताओं के कारण माइक्रोवास्कुलर क्षति होती है। यह देखा गया है कि डायबिटीज किडनी फेलियर का एक प्रमुख कारण है। लगभग 40से 50 प्रतिशत  डायबिटीज रोगियों में क्रोनिक किडनी रोग विकसित होता  है। यदि रोकथाम में उपाय किए जाएं तो हम किडनी फेलियर के 10 प्रतिशत केसेज से बच सकते हैं, हालांकि यह देखने में आया है कि रोकथाम के उपायों की कमी और जागरूकता नहीं होने से डायबिटीज के मरीज को किडनी फेल होना संभव है।‘‘

यहां तक कि किडनी फेलियर कई तरह के होते हैं। सबसे पहले, एक्यूट किडनी फेलियर है। इस तरह की किडनी फेलियर आमतौर पर यह स्थिति उलटने योग्य होती है, और आमतौर पर इसका एक कारण होता है। क्रोनिक किडनी फेलियर में, आमतौर पर एक कारण भी होता है, लेकिन क्षति अपरिवर्तनीय है। क्रोनिक किडनी फेलियर में, क्षति किडनी पर ‘तीव्र‘ हमला नहीं है, बल्कि समय के साथ किडनी के कामकाज में कमी के कारण होती है। डायबिटीज वाले लोगों में एक्यूट किडनी फेलियर हो सकती है। हालांकि, वे अक्सर क्रोनिक किडनी की विफलता है। क्रोनिक किडनी की विफलता के लक्षणों में मूत्र में कमी, या मूत्र नहीं होना या रक्त में अपशिष्ट उत्पादों के स्तर में वृद्धि शामिल है जैसा कि रक्तप्रवाह में क्रिएटिनिन या मूत्र में यूरिया के स्तर में वृद्धि से संकेत मिलता है। रक्त की कमी और प्रोटीन की हानि भी किडनी में कमी या फेलियर का संकेत दे सकती है।

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